बड़ी खुशखबरी: अब मध्य प्रदेश के कर्मचारियों को परिवीक्षा अवधि में मिलेगा 100% पूरा वेतन, उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक आदेश से स्कूल शिक्षा विभाग में जगी बड़ी उम्मीद

देवास/भोपाल। मध्य प्रदेश के शासकीय कर्मचारियों और विशेष रूप से स्कूल शिक्षा विभाग के लाखों नवनियुक्त शिक्षकों व कर्मियों के लिए एक बेहद सुखद और न्यायसंगत खबर सामने आई है। लंबे समय से परिवीक्षा अवधि (Probation Period) के दौरान कम वेतन (स्टाइपेंड) मिलने का दंश झेल रहे कर्मचारियों के हक में न्यायपालिका ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश कार्यालय देवास (म.प्र.) द्वारा जारी एक हालिया आधिकारिक आदेश के बाद प्रदेश के अन्य विभागों, खासकर स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारियों में भी 100 प्रतिशत पूरा वेतन पाने की उम्मीदें अब पूरी तरह से परवान चढ़ चुकी हैं।

क्या है पूरा मामला और न्यायालय का ताजा आदेश?

हाल ही में देवास जिला न्यायालय द्वारा जारी आदेश (क्रमांक 555/लेखा/2026, दिनांक 25/07/2026) में माननीय उच्च न्यायालय मध्य प्रदेश, जबलपुर द्वारा रिट पिटीशन नंबर 20923/2021 (आदेश दिनांक 08.07.2026) और रिट पिटीशन नंबर 14744/2026 (आदेश दिनांक 10.07.2026) में दिए गए निर्णयों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।

माननीय उच्च न्यायालय मध्य प्रदेश, जबलपुर द्वारा पारित इस ऐतिहासिक फैसले की कानूनी बारीकियों, आधारों और प्रमुख बिंदुओं का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:
1. याचिका (Petition) की पृष्ठभूमि और मुख्य विवाद
यह मामला मुख्य रूप से राज्य सरकार के उस नीतिगत निर्णय के खिलाफ था, जिसे वर्ष 2019-20 के दौरान लागू किया गया था। इसके तहत मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियमों में संशोधन करके नवनियुक्त कर्मचारियों (विशेषकर शिक्षकों और सह-न्यायिक स्टाफ) के लिए 3 वर्ष की परिवीक्षा अवधि (Probation Period) तय की गई थी।
इस अवधि के दौरान कर्मचारियों को “स्टाइपेंड” के रूप में वेतन देने का नियम बनाया गया था:
  • प्रथम वर्ष: न्यूनतम वेतनमान का केवल 70%
  • द्वितीय वर्ष: न्यूनतम वेतनमान का केवल 80%
  • तृतीय वर्ष: न्यूनतम वेतनमान का केवल 90%
  • चतुर्थ वर्ष: परिवीक्षा अवधि सफलतापूर्वक पूर्ण होने पर ही 100% पूरा वेतन।
कर्मचारियों (याचिकाकर्ताओं) ने इसे ‘समान कार्य के लिए असमान वेतन’ और युवाओं के आर्थिक शोषण का आधार बताते हुए जबलपुर उच्च न्यायालय में रिट पिटीशन (जैसे WP No. 20923/2021 एवं अन्य) दायर की थी।

2. जबलपुर उच्च न्यायालय के फैसले के मुख्य कानूनी आधार
माननीय उच्च न्यायालय ने याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार के इस 70-80-90% वाले नियम को पूरी तरह से अतार्किक और भेदभावपूर्ण माना। न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित किया:
  • संविधान के अनुच्छेद 14 और 39(d) का उल्लंघन: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 ‘समानता का अधिकार’ देता है और अनुच्छेद 39(d) ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत की वकालत करता है। कोर्ट ने कहा कि जब नवनियुक्त कर्मचारी भी उसी पद पर बैठे अनुभवी कर्मचारियों के बराबर घंटे काम कर रहे हैं और उतनी ही जिम्मेदारी निभा रहे हैं, तो केवल “परिवीक्षा अवधि” के नाम पर उनका वेतन काटना असंवैधानिक है।
  • पूर्णकालिक नियुक्ति (Full-fledged Appointment): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ये कर्मचारी किसी तदर्थ (Ad-hoc) या दैनिक वेतन भोगी के रूप में नियुक्त नहीं हुए हैं। वे एक कठिन और पारदर्शी चयन प्रक्रिया (जैसे व्यापम/ESB या विभागीय परीक्षा) को पास करके पूर्णकालिक और स्थायी पद के विरुद्ध आए हैं। इसलिए वे सेवा के पहले दिन से ही पूर्ण वेतन के हकदार हैं।
  • परिवीक्षा (Probation) का वास्तविक अर्थ: अदालत ने टिप्पणी की कि परिवीक्षा अवधि का उद्देश्य कर्मचारी के आचरण, कार्यक्षमता और व्यवहार को परखना होता है, न कि उसे वित्तीय रूप से दंडित करना या कम वेतन पर काम कराना।

3. न्यायालय द्वारा दिए गए मुख्य निर्देश (Relief Granted)
जबलपुर उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य शासन और संबंधित विभागों को निम्नलिखित कड़े निर्देश दिए:
  • 100% वेतन की तत्काल स्वीकृति: सभी प्रभावित कर्मचारियों को उनकी “नियुक्ति तिथि” (Date of Joining) से ही संबंधित पद के न्यूनतम वेतनमान का 100 प्रतिशत भुगतान किया जाए।
  • पिछली कटौतियों की प्रतिपूर्ति (एरियर भुगतान): जिन कर्मचारियों का परिवीक्षा अवधि के दौरान 10%, 20% या 30% वेतन काटा जा चुका है, उन्हें उस कटी हुई राशि का पूरा हिसाब लगाकर एरियर (Back wages/Arrears) के रूप में भुगतान किया जाए।
  • काल्पनिक नहीं, वास्तविक लाभ: इस लाभ को केवल कागजी या काल्पनिक (Notional) न मानकर वास्तविक वित्तीय लाभ (Financial Benefit) के रूप में लागू करने का आदेश दिया गया।

4. देवास न्यायालय के आदेश में इसका क्रियान्वयन
इसी जबलपुर उच्च न्यायालय के आदेश (दिनांक 08.07.2026 और 10.07.2026) का पालन करते हुए ही देवास जिला न्यायालय के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने अपने अधीन आने वाले सभी 24 कर्मचारियों (जैसा कि मूल पत्र की तालिका में अंकित है) को उनकी पुरानी नियुक्ति तिथियों (जैसे वर्ष 2021, 2022, 2023, 2024 और 2025) से ही 100 प्रतिशत वेतन स्वीकृत कर दिया है।

 

इस आदेश के तहत, स्थापना पर गठित प्रशासनिक समिति की अनुशंसा के आलोक में विभिन्न कर्मचारियों को उनकी नियुक्ति तिथि से ही वेतनमान में न्यूनतम का 100 प्रतिशत वेतन स्वीकृत कर दिया गया है। गौरतलब है कि इससे पहले तत्कालीन नियमों (जैसे 70-80-90% फॉर्मूला) के तहत प्रथम वर्ष 70 प्रतिशत, द्वितीय वर्ष 80 प्रतिशत और तृतीय वर्ष 90 प्रतिशत वेतन देने का प्रावधान था, जिसे अब पूरी तरह दरकिनार कर कर्मचारियों को उनके सेवा के पहले दिन से ही पूर्ण भुगतान (पूरा वेतन) का हकदार माना गया है।

स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के लिए क्यों है यह संजीवनी?

मध्य प्रदेश का स्कूल शिक्षा विभाग प्रदेश के सबसे बड़े एम्प्लॉयर (रोजगार प्रदाता) विभागों में से एक है। पिछले कुछ वर्षों में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षकों की बड़े पैमाने पर नियुक्तियां की गई हैं। इन नवनियुक्त शिक्षकों को भी तत्कालीन राज्य सरकार के “70%, 80%, 90% वेतनमान” वाले नियम के तहत मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा था।

समान कार्य के लिए असमान वेतन और परिवीक्षा अवधि के नाम पर पूरा वेतन न देना युवाओं के मनोबल को लगातार गिरा रहा था। अब जब उच्च न्यायालय के आदेश पर जिला न्यायालयों और अन्य प्रशासनिक इकाइयों में 100% वेतन देने के आदेश धरातल पर उतरने लगे हैं, तो स्कूल शिक्षा विभाग के संगठनों और नवनियुक्त शिक्षकों ने भी इस आदेश को आधार बनाकर शासन स्तर पर अपनी पैरवी तेज कर दी है।

आदेश के प्रमुख बिंदु और कानूनी आधार

इस न्यायसंगत बदलाव के पीछे माननीय उच्च न्यायालय के दो प्रमुख कानूनी बिंदु और याचिकाएं आधार बनी हैं:

  1. समानता का अधिकार: न्यायालय का मानना है कि जब कोई कर्मचारी पूरी चयन प्रक्रिया को पार करके पूर्णकालिक पद पर नियुक्त होता है, तो उससे काम पूरा लिया जाता है। ऐसे में परिवीक्षा अवधि के नाम पर उसका वेतन काटना भारतीय संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
  2. पिछली कटौतियों की भरपाई (एरियर की आस): इस आदेश की सबसे बड़ी खास बात यह है कि इसमें कर्मचारियों को उनकी ‘नियुक्ति दिनांक से’ ही 100% वेतनमान का लाभ दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि जिन कर्मचारियों का शुरुआती सालों में 10 से 30 फीसदी वेतन काटा गया था, उन्हें अब एरियर (बकाया राशि) मिलने का रास्ता भी साफ हो गया है।
शिक्षक संगठनों में भारी उत्साह, सरकार पर बढ़ा नीतिगत बदलाव का दबाव

उच्च न्यायालय के इस रुख और देवास न्यायालय के क्रियान्वयन आदेश के बाद मध्य प्रदेश के विभिन्न शिक्षक संगठनों (जैसे म.प्र. शिक्षक कांग्रेस, आजाद अध्यापक संघ आदि) ने हर्ष व्यक्त किया है। शिक्षक प्रतिनिधियों का कहना है कि यह आदेश केवल अदालती बाबू या न्यायिक सेवा के कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। चूंकि उच्च न्यायालय की रिट पिटीशन में तय किया गया सिद्धांत पूरे राज्य और सभी विभागों पर समान रूप से लागू होता है, इसलिए स्कूल शिक्षा विभाग को तुरंत एक सामान्य आदेश जारी कर राज्य के सभी नवनियुक्त शिक्षकों को इसका लाभ देना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस अदालती आदेश के बाद अब स्कूल शिक्षा विभाग और वित्त विभाग के पास पुराना नियम जारी रखने का कोई कानूनी आधार नहीं बचा है। यदि सरकार खुद से सभी विभागों के लिए यह आदेश लागू नहीं करती है, तो शिक्षा विभाग के कर्मचारी भी सामूहिक रूप से उच्च न्यायालय की शरण ले सकते हैं, जहाँ से उन्हें जीत मिलना तय है। ऐसे में सरकार अपनी साख बचाने और लोक-कल्याणकारी छवि को मजबूत करने के लिए जल्द ही कैबिनेट में इस पर बड़ा फैसला ले सकती है।

आर्थिक मजबूती से बढ़ेगा शिक्षा का स्तर

एक शिक्षक जब मानसिक और आर्थिक रूप से निश्चिंत होता है, तो उसका सीधा सकारात्मक असर स्कूल के बच्चों और शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है। प्रदेश के ग्रामीण और दूरदराज के अंचलों में पदस्थ नवनियुक्त शिक्षकों का कहना है कि कम वेतन मिलने के कारण उन्हें मकान किराया, यात्रा और दैनिक खर्चों को पूरा करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। 100% वेतन मिलने से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी, बल्कि वे पूरी ऊर्जा और ईमानदारी के साथ प्रदेश के नौनिहालों का भविष्य संवार सकेंगे।

न्याय की जीत और एक सुनहरे भविष्य की शुरुआत

देवास जिला न्यायालय द्वारा जारी यह आदेश मध्य प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। यह आदेश इस बात का जीवंत प्रमाण है कि देर से ही सही, लेकिन न्यायपालिका हमेशा कर्मचारियों के जायज हकों की रक्षा के लिए तत्पर रहती है। स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के लिए यह केवल एक अदालती फैसला नहीं, बल्कि उनके हक, सम्मान और आर्थिक स्वतंत्रता की एक नई सुबह है। अब देखना यह है कि स्कूल शिक्षा विभाग का प्रशासनिक अमला कितनी जल्दी इस आदेश को आत्मसात कर अपने लाखों कर्मठ शिक्षकों को यह बड़ा तोहफा देता है।


प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश कार्यालय देवास (म.प्र.) द्वारा जारी आधिकारिक आदेश देखें –

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