
भोपाल। मध्यप्रदेश शासन के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 30 जुलाई 2018 को जारी असाधारण राजपत्र (क्रमांक 426) के अनुसार, प्रदेश के शैक्षणिक संवर्ग में पदोन्नति और भर्ती की प्रक्रियाओं को लेकर व्यापक बदलाव किए गए हैं। इस शासकीय राजपत्र के लागू होने के बाद, उच्च माध्यमिक शिक्षकों (Ucch Madhyamik Shikshak) के लिए हाई स्कूल प्राचार्य (Principal, High School) के पद पर पदोन्नत होने की राह अब केवल वरिष्ठता पर निर्भर नहीं है। नए नियमों के तहत अब शिक्षकों को एक कठिन विभागीय प्रक्रिया, अनिवार्य परीक्षा और कड़ी शर्तों से गुजरना होगा।
इस नई व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ‘कंडिका 14(2)’ के रूप में सामने आया है, जिसने पदोन्नति की पूरी व्यवस्था को ही बदल कर रख दिया है। आइए इस ऐतिहासिक राजपत्र के प्रकाश में विस्तार से समझते हैं कि एक उच्च माध्यमिक शिक्षक से हाई स्कूल प्राचार्य बनने की पूरी प्रक्रिया, पदों की स्वीकृत संख्या और नियम क्या हैं।
राजपत्र की महत्वपूर्ण तारीखें और प्रवृत्त होने का समय
स्कूल शिक्षा विभाग, मंत्रालय (वल्लभ भवन, भोपाल) द्वारा यह आदेश दिनांक 28 जुलाई 2018 को तैयार किया गया था, जिसे प्राधिकार से 30 जुलाई 2018 को मध्यप्रदेश राजपत्र के रूप में प्रकाशित किया गया। नियमों के संक्षिप्त नाम “मध्यप्रदेश राज्य स्कूल शिक्षा सेवा (शैक्षणिक संवर्ग), सेवा शर्तें एवं भर्ती नियम, 2018” के तहत ये समस्त नियम 01 जुलाई 2018 से पूरे प्रदेश में प्रभावी (प्रवृत्त) माने गए हैं।
हाई स्कूल प्राचार्य और उच्च माध्यमिक शिक्षकों (Ucch Madhyamik Shikshak) के कुल स्वीकृत पद
राजपत्र की ‘अनुसूची-एक’ (नियम-5 देखें) में पदों के वर्गीकरण, वेतनमान और कुल स्वीकृत पदों की संख्या का स्पष्ट विवरण दिया गया है:
- प्राचार्य हाईस्कूल (Principal, High School): इस संवर्ग में कुल 1,050 पद स्वीकृत किए गए हैं। यह पद द्वितीय श्रेणी (Class-II) का है, जिसका पे-बैण्ड 9300-34800 और ग्रेड-पे 4200 निर्धारित है। इस पद के लिए मुख्य नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी ‘आयुक्त, लोक शिक्षण’ (Commissioner, Public Instruction) हैं।
- उच्च माध्यमिक शिक्षक (Ucch Madhyamik Shikshak): इस पद के लिए कुल स्वीकृत पदों की संख्या 34,789 है। यह पद भी द्वितीय श्रेणी का है, जिसका पे-बैण्ड 9300-34800 और ग्रेड-पे 3600 है। इसकी नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी भी ‘आयुक्त, लोक शिक्षण’ हैं।
‘अनुसूची-दो’ (नियम 5 और 14 देखें) के अनुसार, हाई स्कूल प्राचार्य के 1050 पदों को 100 प्रतिशत पदोन्नति द्वारा ही भरा जाना तय किया गया है, जिसका सीधा लाभ वर्तमान उच्च माध्यमिक शिक्षकों को मिलता है, बशर्ते वे तय मापदंडों को पूरा करते हों।
कंडिका 14 (2) की अनिवार्यता: अब विभागीय परीक्षा पास करना बेहद जरूरी
राजपत्र के भाग ‘नियम 14’ के अंतर्गत ‘पदोन्नति द्वारा नियुक्ति’ का विशेष प्रावधान किया गया है। इसकी कंडिका 14 (2) स्पष्ट रूप से यह घोषणा करती है कि:
“अनुसूची-एक में अनुक्रमांक-1 के सामने उल्लिखित प्राचार्य हाईस्कूल की पदोन्नति के लिये विभागीय परीक्षा में न्यूनतम अर्हता (न्यूनतम अंक) प्राप्त करना अनिवार्य होगा, जैसा कि शासन द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए। तत्पश्चात् इन लोक सेवकों की पदोन्नति वरिष्ठता सह-उपयुक्तता (Seniority cum merit) के आधार पर की जाएगी।”
इसका सीधा तात्पर्य यह है कि अब केवल अधिक उम्र या सेवा के वर्षों (वरिष्ठता) के आधार पर कोई उच्च माध्यमिक शिक्षक सीधे प्राचार्य नहीं बन पाएगा। उन्हें शासन द्वारा आयोजित सीमित विभागीय परीक्षा को अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर अपनी योग्यता साबित करनी होगी।
पदोन्नति के लिए आवश्यक योग्यताएं और अनुभव (अनुसूची-चार)
राजपत्र की ‘अनुसूची-चार’ के सरल क्रमांक 1 के अनुसार, उच्च माध्यमिक शिक्षक से हाई स्कूल प्राचार्य के पद पर जाने के लिए निम्नलिखित कड़े नियम तय किए गए हैं:
- 5 वर्ष का न्यूनतम अनुभव: पदोन्नति की दौड़ में शामिल होने के लिए उच्च माध्यमिक शिक्षक के पद पर कम से कम 05 वर्ष की अर्हकारी सेवा पूर्ण होना अनिवार्य है, जिसकी गणना उस वर्ष की 1 जनवरी से की जाएगी।
- गोपनीय चरित्रावली (ACR): पदोन्नति के समय शिक्षक की वार्षिक गोपनीय चरित्रावली को संज्ञान में लिया जाएगा। यदि किसी शिक्षक की गोपनीय चरित्रावली में कोई भी प्रतिकूल टिप्पणी (Adverse Entry) पाई जाती है, तो उसकी पदोन्नति पर विचार नहीं किया जाएगा।
- विभागीय पदोन्नति समिति (DPC): इस प्रारंभिक चयन के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाएगा, जिसकी बैठक वर्ष में कम से कम दो बार होगी। इस समिति के सदस्य निम्नलिखित होंगे:
- आयुक्त, लोक शिक्षण – अध्यक्ष
- संचालक, लोक शिक्षण – सदस्य
- अतिरिक्त संचालक / संयुक्त संचालक, लोक शिक्षण – सदस्य
- उप संचालक / सहायक संचालक – सदस्य सचिव
पदोन्नति के बाद की कड़ियां: 3 वर्ष ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा और कड़ा प्रशिक्षण
पदोन्नति की प्रक्रिया सिर्फ परीक्षा पास करने पर खत्म नहीं होती। राजपत्र की ‘अनुसूची-चार’ की विशेष टीप (2) के अनुसार, पदोन्नत होने वाले लोक सेवकों के लिए कार्यप्रणाली को बहुत सख्त बनाया गया है:
- ग्रामीण क्षेत्रों में अनिवार्य पदस्थापना: पदोन्नति प्राप्त करने वाले प्राचार्य की पदस्थापना अनिवार्य रूप से तीन वर्ष के लिए ग्रामीण क्षेत्र की शालाओं में की जाएगी।
- एक माह का प्रबंधन प्रशिक्षण: इस अवधि में पदोन्नत प्राचार्य को शैक्षणिक प्रबंधन में डिप्लोमा या प्रमाण पत्र देने वाली किसी मान्यता प्राप्त संस्था से एक माह का प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा। इसके अतिरिक्त, सीमेट (SIEMAT) या भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), इंदौर अथवा अन्य प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थाओं से एक माह का विशेष ‘नेतृत्व प्रशिक्षण’ (Leadership Training) लेना अनिवार्य होगा।
- प्रशिक्षण में असफल होने पर डिमोशन: यदि कोई पदोन्नत प्राचार्य इस प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूर्ण नहीं कर पाता है, तो उसे एक वर्ष का अतिरिक्त अवसर दिया जाएगा। इसके बावजूद भी असफल रहने पर, संबंधित लोक सेवक को प्राचार्य पद से हटाकर वापस उसके पदोन्नति के पूर्व वाले पद (उच्च माध्यमिक शिक्षक) पर प्रत्यावर्तित (Demote) कर दिया जाएगा।
राष्ट्रीय/राज्य पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों के लिए विशेष लाभ
इसी नियम के तहत एक राहत भरी खबर भी है। अनुसूची-चार की टीप (1) के अनुसार, यदि किसी शिक्षक को राष्ट्रीय या राज्य योजना पुरस्कार के अंतर्गत राष्ट्रपति या राज्यपाल पुरस्कार प्राप्त हो चुका है, तो उसे नियमों के अधीन पात्रता होने पर पारी बाहर (Out of turn) पदोन्नति देने का भी प्रावधान रखा गया है।
निष्कर्ष: स्कूल शिक्षा विभाग के 30 जुलाई 2018 के इस राजपत्र ने स्पष्ट कर दिया है कि मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में प्रशासनिक नेतृत्व (प्राचार्य पद) को मजबूत करने के लिए शासन पूरी तरह गंभीर है। कंडिका 14(2) और अनिवार्य आईआईएम प्रशिक्षण जैसे कड़े प्रावधानों के जरिए अब केवल योग्य, ऊर्जावान और प्रशासनिक दक्षता रखने वाले शिक्षक ही हाई स्कूल के प्राचार्य बन पा रहे हैं।
नोट – पूरी प्रक्रिया में उल्लेखनीय विन्दु यह है 2018 के पश्चात इस राजपत्र में कई संशोधन किये गए किन्तु उच्च माध्यमिक शिक्षक (Ucch Madhyamik Shikshak) से प्राचार्य हाई स्कूल के पद पर पदोन्नति की इसी प्रक्रिया को यथावत रखा गया है I
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