विशेष संवाददाता, भोपाल
15 जुलाई 2026
भोपाल: मध्य प्रदेश में ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्मार्ट क्लासरूम’ के बड़े-बड़े दावों के बीच जमीनी हकीकत चिंताजनक बनी हुई है। प्रदेश के 3,200 से अधिक सरकारी हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा पूरी तरह से ठप पड़ी है। केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ‘पीएमश्री योजना’ (PM SHRI Scheme) और ‘समग्र शिक्षा अभियान’ के अंतर्गत करोड़ों रुपये खर्च कर कंप्यूटर लैब तो बना दिए गए हैं, लेकिन इनमें पढ़ाने के लिए अब तक इस सत्र ( 2026-27) में आईसीटी (ICT) इंस्ट्रक्टर और दिव्यांग बच्चों के लिए स्पेशल एजुकेटर्स की नियुक्तियां नहीं हो सकी हैं। इसके चलते स्कूलों में ताला बंद कंप्यूटर लैब केवल शोपीस बनकर रह गए हैं।

नई शिक्षा नीति की उड़ रही धज्जियां
एक तरफ राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में कक्षा छठी से ही बच्चों को कोडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और कंप्यूटर का व्यावहारिक ज्ञान देने पर जोर दिया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, मध्य प्रदेश के हजारों ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के विद्यार्थियों को माउस पकड़ना तक नसीब नहीं हो रहा है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, समग्र शिक्षा अभियान के तहत प्रदेश भर के स्कूलों में ‘ICT@School’ योजना लागू की गई थी। इसके लिए बकायदा बजट भी जारी किया जाता है और लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) द्वारा नवीन सत्र में अप्रैल माह में कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर्स की सेवाएं ली थीं। लेकिन गत 1 माह से अधिक समय बीत जाने के बाद बी इन विद्यालयों में ICT इंस्ट्रक्टर और दिव्यांग बच्चों के लिए स्पेशल एजुकेटर्स की जोइनिंग की प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है। ICT इंस्ट्रक्टर और दिव्यांग बच्चों के लिए स्पेशल एजुकेटर्स द्वारा इस सम्बन्ध में कई बार लोक शिक्षण संचालनालय भोपाल में ज्ञापन आदि दिए किन्तु शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद भी नए सिरे से इंस्ट्रक्टर्स की जॉइनिंग नहीं कराई जा सकी है।
पीएमश्री स्कूल भी पड़े सूने
प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया यानी ‘पीएमश्री’ के तहत जिन स्कूलों को मॉडल स्कूल के रूप में विकसित किया गया है, वहां भी स्थिति बदतर है। इन हाई-टेक स्कूलों में लाखों रुपये के कंप्यूटर, प्रोजेक्टर और स्मार्ट बोर्ड धूल खा रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि जब स्कूलों में कंप्यूटर सिखाने वाला ही कोई नहीं है, तो इन चमचमाती लैब्स का क्या फायदा? छात्र केवल थ्योरी की किताबों से कंप्यूटर की परिभाषाएं रटने को मजबूर हैं, जबकि व्यावहारिक ज्ञान शून्य है।
स्पेशल एजुकेटर न होने से दिव्यांग छात्र बेहाल
कंप्यूटर शिक्षा के अलावा स्कूलों में समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) का भी बुरा हाल है। ‘समग्र शिक्षा अभियान’ के तहत दिव्यांग (CWSN) बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विशेष शिक्षकों (Special Educators) की नियुक्ति की जानी थी। प्रशासनिक लेटलतीफी के कारण हजारों स्कूलों में स्पेशल एजुकेटर्स के पद खाली पड़े हैं। इसके कारण मूक-बधिर, दृष्टिबाधित और मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को संभालने और उन्हें पढ़ाने के लिए सामान्य शिक्षकों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे इन बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार और विशेषज्ञ?
शिक्षाविदों का मानना है कि निजी स्कूल पहली कक्षा से ही बच्चों को कंप्यूटर फ्रेंडली बना देते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों के बच्चों को उच्च माध्यमिक स्तर तक भी बेसिक कंप्यूटर चलाना नहीं आता। यह अंतर सरकारी स्कूल के छात्रों को प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेल रहा है। इस पूरे मामले पर स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी I
अब देखना यह होगा कि विभाग कब तक कुंभकर्णी नींद से जागता है और इन 3,200 से अधिक स्कूलों के लाखों छात्र-छात्राओं को कब तक डिजिटल साक्षरता का हक मिल पाता है।



